Saturday, October 16, 2010

राह में चलते चलते

राह में चलते चलते
यूँ ही कोई मिल जाता है
चलता है संग, पल भर
अगले मोड़ बिछड़ जाता है
नयनों में स्नेह, प्रीति की
धीरे से उर को छल जाता है
हृदय की निष्ठुरता तो देखो
आँखें बंद रह बदल जाता है
क्या सोचे ये मन भला
इन सुंदरियों का न संग भला
देख इन्हें सन्यासी मनन भी
मोह मिलाप में खो जाट है
चलता है संग, पल भर
अगले मोड़ बिछड़ जाता है
चन्द्र चंचल सा रूप तेरा
क्षीर सागर सा मन ये मेरा
सघन संकुचित मनुभावों में
तेरा स्वप्न सजाता है
चलता है संग, पल भर
अगले मोड़ बिछड़ जाता है !

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