राह में चलते चलते
यूँ ही कोई मिल जाता है
चलता है संग, पल भर
अगले मोड़ बिछड़ जाता है
नयनों में स्नेह, प्रीति की
धीरे से उर को छल जाता है
हृदय की निष्ठुरता तो देखो
आँखें बंद रह बदल जाता है
क्या सोचे ये मन भला
इन सुंदरियों का न संग भला
देख इन्हें सन्यासी मनन भी
मोह मिलाप में खो जाट है
चलता है संग, पल भर
अगले मोड़ बिछड़ जाता है
चन्द्र चंचल सा रूप तेरा
क्षीर सागर सा मन ये मेरा
सघन संकुचित मनुभावों में
तेरा स्वप्न सजाता है
चलता है संग, पल भर
अगले मोड़ बिछड़ जाता है !
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