कुछ तो हुआ है,
कैसा है ये डर
ज़िन्दगी चली जा रही कहीं,
कटती दिन रात, यूँ ही
सोच को दूर तक ले जाना,
फिर तुरंत चौंक वापस लाना
डरा डरा सा सब माहौल है,
हर तरफ एक जल्दी का शोर है
इसी रस्ते पर थकने लगा हूँ,
कदम कदम पर रुकने लगा हूँ
संदेह अपने पर होता,
अपनी क्षमता पर
जाना तो चाहता हूँ पर,
जाना किधर
कुछ तो हुआ है,
कैसा है ये डर||
© ऐश्वर्य कुमार श्रीवास्तव
कैसा है ये डर
ज़िन्दगी चली जा रही कहीं,
कटती दिन रात, यूँ ही
सोच को दूर तक ले जाना,
फिर तुरंत चौंक वापस लाना
डरा डरा सा सब माहौल है,
हर तरफ एक जल्दी का शोर है
इसी रस्ते पर थकने लगा हूँ,
कदम कदम पर रुकने लगा हूँ
संदेह अपने पर होता,
अपनी क्षमता पर
जाना तो चाहता हूँ पर,
जाना किधर
कुछ तो हुआ है,
कैसा है ये डर||
© ऐश्वर्य कुमार श्रीवास्तव
No comments:
Post a Comment